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The meaning of being a Bhagat – भगत होने का अर्थ


मेघ भगत समुदाय के लोगों में भक्तिभाव आने का क्या कारण है इसके बारे में भगत मुंशीराम जी ने अपनी पुस्तक मेघमाला के प्रकरण-2 (p-33) में लिखा है:-

….भगत बनने का संस्कार भी उन्होंने (मेघ भगतों ने) इसी (हिंदू) धर्म से ग्रहण किया. इस धर्म पर चलते-चलते आर्थिक दशा अच्छी न होने के कारण और अशिक्षित रहने के कारणइस जाति में गरीबीअधीनता और दासपने का आना स्वाभाविक है. जिस जाति के लोगों की आवश्यकताएँ सीमित हो जाती हैं वो जिस काम में भी लगें होवो किसी प्रकार का भी होआय-व्यय का कोई प्रश्न नहींवे जैसा वक़्त आ गया वैसा काट लेते हैं. ऐसी स्वाभाविक रहनी के लोग स्वाभाविक भगत हो जाते हैं. आप पूछेंगे कि आप यह क्या कह रहे हैं. भक्ति भाव तो बड़े-बड़े तप करने के बाद आता है. इसके लिए लोग घर-बारकामकाजधन-धान्यमान-प्रतिष्ठा छोड़ कर जंगलों और पहाड़ों की गुफाओं में जाकर कठिन साधन करते हैंतब जाकर भक्तिभाव आता है. मेघ जाति के लोगों ने कोई तप नहीं कियाकोई साधन नहीं किया तो कैसे भगत बन गए. यह प्रकृति का एक भेद है जिसको सर्वसाधारण चाहे किसी भी जाति का होकिसी भी धर्म को मानने वाला होनहीं जानताजब तक कि उसे प्रकृति का ज्ञान न हो जाए. मैंने अपने सत्गुरु हुजूर परमदयाल फकीरचन्द जी महाराज से जो कुछ समझा उसे बताने की कोशिश करूँगा. हर एक आदमी अगर ध्यान से अपने अन्दर देखे तो पता चलेगा कि हर समय कोई न कोई इच्छाआशा और वासना हर व्यक्ति के अन्दर उठती रहती है. उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए हम हरकत में आ जाते हैंकर्म करते हैं. इच्छा पूरी हो जाने के बाद जिस चीज़ की इच्छा कीउसका भोग करते हैं और भोग से आनन्दखुशी लेते हैं. फिर और इच्छा पैदा होती है कि इस प्रकार के भोग भोगते रहें. इसी तरह इच्छाकर्मफलभोग फिर इच्छाकर्मफल और भोग का चक्कर चलता रहता है. जब तक यह चक्कर है कोई भी व्यक्ति भगत नहीं बन सकता. भगत वो है जिसकी आवश्यकताएँ कम हो गई होंअधिक भोग-विलास की इच्छा न रही हो. चाहे ये आवश्यकताएँ और इच्छाएँ तप करने से अपने अधीन कर लो या उसकी जिन्दगी में दूसरे लोग उसको दबाए रखेंदलित और पतित बनाए रखें उसको आश्रित बनाए रखेंउसका कोई काम बड़े लोगों की सहायता के बगैर न हो सकता हो तो थोड़े मेंग़रीबी मेंपतितपने में अपना जीवन गुजारता है. उसकी इच्छाएँ और वासनाएँ बलपूर्वक दबा दी जाती हैं. जिसकी आवश्यकताएँ बहुत सीमित हो गई हों और उसके अनुसार वासनाओं का उठना भी कम हो गया वह बिना किसी तप-साधन और अभ्यास के भगत बन सकता है और भक्ति भावना को अपने चित्त पटल में जगह दे सकता है.
भगत मुंशीराम जी ने जिस भगत की व्याख्या की है उसकी पृष्ठभूमि के बारे में वे बहुत साफ तौर पर लिख रहे हैं कि इस धर्म पर चलते-चलते आर्थिक दशा अच्छी न होने के कारण और अशिक्षित रहने के कारणइस जाति में गरीबीअधीनता और दासपने का आना स्वाभाविक है’. आगे की बात भी वे बहुत सावधानीपूर्वक लेकिन स्पष्टता के साथ कह रहे हैं कि- उसकी इच्छाएँ और वासनाएँ बलपूर्वक दबा दी जाती हैं. 
मैं उक्त व्याख्या से यही समझ पाया हूँ कि भगत उसे कहा जाता है जो अशिक्षा का शिकार हो, ग़रीब होअभाव में होधार्मिक विचारों का सहारा लेकर गुज़ारा करता हो और ईश्वर का धन्यवाद करता हो.

क्या लाला गंगाराम ने इसी अर्थ में मेघों को भगत कहा था? 
शायद हाँ.

Megh Bhagats of J&K struggle for survival

(1)

Megh Bhagat – मेघ भगत

Their habitats उनके घर

Their capital उनकी पूँजी
Their way to development उनका विकास मार्ग

Their roofs उनकी छतें

They compete with heavy weight cloth industry
भारी कपड़ा उद्योग के साथ प्रतियोगिता
Below you can see a community Hall being constructed for them. Hiranagar B D O block is constructing this community Hall at village Ladyal Hiranagar, S C Mohalla for the past about 12 years.
A house of Bhagats in the heart of Samba city

(2)

Their displacement due to terrorism

घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए सरकार ने सरकारी भवनों के दरवाज़े खोल दिए थे लेकिन आतंकवाद के कारण कई क्षेत्रों से विस्थापित मेघों की ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं. इनकी कहानी एक गुमनामी की कहानी है. गरीबी में रह रहे इस समुदाय के लोग कारे बेगार कानून की पीड़ा भुगत चुके हैं और कश्मीरियों और जम्मू के डोगरों की संपन्नता के पीछे इनका खून-पसीना साफ़ चमकता है. 

There are many more Megh Bhagats from Kishatwar now living in Kathua District who had to leave their homes and land. Now they have no land to cultivate, no permanent work or employment. They have settled in village Bhalua Budhi, Barnoti, Nagri and near Sakta Chack. There are about 30 families. Just look at their conditions.

(Contributed by Sh. Tara Chand Bhagat of Udhampur via Face Book)

Bhagat Buddamal – भगत बुड्डामल


Bhagat Budda Mal Ji

सन् 1947 में पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए और जालंधर में बसे मेघ भगत समाज में लगभग सभी लोग एक नाम से भली-भाँति परिचित हैं- भगत बुड्डामल. भार्गव कैंप, जालंधर में उनके नाम से एक ग्राऊँड बना है जिसे भगत बुड्डामल ग्राऊँड कहते हैं.

विडंबना है कि आज मेघ भगत समाज में बहुत कम लोग इस सामाजिक कार्यकर्ता के बारे में विस्तार से जानते हैं जिसने अपने समुदाय के लिए जीवन भर अथक परिश्रम किया ताकि यह समुदाय भविष्य में भली प्रकार से ससम्मान जीवन व्यतीत कर सके.

उनका जन्म और पालन-पोषण स्यालकोट, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था. वे मेघ जाति के एक सामान्य परिवार में जन्मे थे. बहुत शिक्षित नहीं थे. लेकिन छोटी आयु में ही वे समाज सेवा के कार्य में प्रवृत्त हो गए थे. भारत में आने के बाद तो वे आजीवन समाज सेवा में रहे. मैंने स्वयं उन्हें अमृतसर, जालंधर और चंड़ीगढ़ में समाज सेवा में सक्रिय देखा है.

  
उनकी दिनचर्या ही थी कि वे सहायता माँगने आए किसी भी आगंतुक के साथ हो लेते और उसकी भरपूर मदद करते. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे अन्य मेघ भगतों की भाँति भार्गव कैंप, जालंधर में बस गए. यहाँ रहते हुए उन्होंने भगत गोपीचंद के साथ मिल कर बहुत कार्य अपने समाज के लिए किया. वे कई बार जालंधर म्युनिसिपल कार्पोरेशन के सदस्य चुने गए. वे अकेले या अपने साथी सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में आते रहे और यहाँ भगत मिल्खीराम (पीसीएस), श्री केसरनाथ जी, सत्यव्रत शास्त्री जी आदि के साथ मिल कर उन्होंने बहुत से लोगों के नौकरियों आदि से संबंधित कार्य कराए जिससे समुदाय के लोगों को लाभ पहुँचा.

इनकी धर्मपत्नी का नाम भगवंती था. इनके अपनी कोई संतान नहीं थी अतः अपने भाई की संतान को गोद लेकर पाला. दमकता हुआ गोरा चेहरा. लंबा कुर्ता, तुर्रे वाली अफ़ग़ानी पगड़ी और पठानी सलवार पहनने वाले बुड्डामल जी का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक और प्रभावपूर्ण था. वे धीरे-धीरे प्रेमपूर्वक और ठहरी हुई बात करते थे.

उनके कार्य और समाज सेवा के मद्देनज़र सरकार ने उनकी स्मृति में भार्गव कैंप में श्री बुड्डामल पार्क बना दिया और उनके कार्य के महत्व को मान्यता दी.

पार्क बनने के साथ उनका नाम अमर तो हो गया लेकिन उनके बारे में अभी बहुत-सी जानकारियाँ जुटाई जानी बाकी हैं. अभी हाल ही में भगत चूनी लाल भगत के नागरिक अभिनंदन समारोह में श्री बुड्डामल जी को याद किया गया था.

अब बेहतर हो कि हमारे सामाजिक संगठन अपने पूर्ववर्ती सामाजिक कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी जुटाएँ और समय-समय पर उनके संबंध में उपलब्ध सामग्री को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का उपक्रम करें आखिर वे हमारे लिए कल्याणकारी सोच रखने वाले प्रेरणा स्रोत हैं.

मेरे विचार से भगत बुड्डामल पार्क में उनकी मूर्ति लगाई जानी चाहिए ताकि आने वाले समय में हम सभी उनके कार्य से प्रेरणा ले सकें. यहाँ के वाटर टैंक पर बुड्डामल पार्क लिखा जा सकता है ताकि पार्क का नाम दूर से पढ़ा जा सके.
विशेष टिप्पणी :-
 
कुछ समय पूर्व भगत बुड्डामल ग्राऊँड में शनि सहित कई देवी-देवताओं का मंदिर बना दिया गया हैयह सोचने की बात है कि किसी मेघ भगत के नाम से पंजाब में इस प्रकार की यह एकमात्र ग्राऊंड है. माना कि यह सरकारी जगह है लेकिन इसका उपयोग पार्क की तरह ही होना चाहिए. बेहतर होगा कि शनि मंदिर को कहीं और शिफ्ट किया जाए.
सोचने की बात है कि आपको ‘आर्य समाज स्कूल‘ सुनने में अच्छा लगता है कि ‘मेघ हाई स्कूल‘. ऐसे ही सोच लें कि भगत बुड़्डामल ग्राऊँड‘ सुनने में अच्छा लगता है या शनि मंदिर ग्राऊँड‘. यदि मेघ भगत समुदाय या उसके किसी सदस्य के नाम पर कोई स्थल या शिक्षण संस्थान बने तो उससे समुदाय की छवि बेहतर बनती है. विचार करें.

‘मेघ चेतना’ का एक पुराना पृष्ठ
विशेष आभार

भगत बुड्डामल जी के फोटो और उनकी पेंटिंग की फोटो देने के लिए भगत बुड्डामल जी के परिवार का तथा पार्क के चित्र भेजने के लिए युवा ब्लॉगर श्री मोहित भगत का बहुत आभार. उनकी सहायता के बिना यह कार्य संभव नहीं था.

614th Anniversary of Sant Satguru Kabir – संत सत्गुरु कबीर का 614वाँ प्रकाशोत्सव

मेघ भगतों की सामाजिक संस्था भगत महासभा (Bhagat Mahasabha), जम्मू पिछले चार वर्ष से कबीर का प्रकाशोत्सव पैरेड ग्राऊँड, जम्मू में मनाती आ रही है. वर्ष 2010 में मैंने जम्मू में 612वें प्रकाशोत्सव का कार्यक्रम देखा था. मेघ भगतों का इतना बड़ा सामाजिक-धार्मिक समागम उससे पूर्व मैंने कहीं नहीं देखा था. 03-07-2010 को MEGHnet की यह पहली पोस्ट बनी. इससे पूर्व 10-06-2012 से मैं Megh Bhagat ब्लॉग लिख रहा था. (इसी बहाने याद आया है कि मेरी ब्लॉगिंग के दो साल होने को आए हैं.)
इस वर्ष भी जम्मू का पारा 44-45 डिग्री सेल्सियस के आसपास चल रहा था और आयोजन की तिथि (04-06-2012) की सूचना मिल चुकी थी. डॉ. ध्यान सिंह से बात हुई और हम दोनों जम्मू पहुँचे. वे इस कार्यक्रम को देखने के लिए बहुत उत्सुक थे. 03-06-2012 को सायं हम पैरेड ग्राऊँड में गए जहाँ भगत महासभा के कार्यकर्ता आवश्यक प्रबंध करा रहे थे. डॉ. ध्यान सिंह शोधकर्ता हैं. पैरेड ग्राऊँड में वे अपना कार्य जारी रखे हुए थे. वे लोगों से बातचीत करते रहे, सवाल पूछते रहे और जानकारी साझा करते रहे. उनका एक प्रश्न बहुतों के लिए चौंकाने वाला था जब उन्होंने पूछा कि आप कब से कबीरपंथी हैं. उनके इस कठिन प्रश्न के कई उत्तर आए जिन्हें किसी और अवसर पर लिखने के लिए रख छोड़ा है.

यह देख कर खुशी होती है कि भगत महासभा, जम्मू के कार्यकर्ता युवा हैं. जम्मू क्षेत्र में डॉ. राजेश भगत के नेतृत्व में एक बहुत बढ़िया टीम मेघों की सामाजिक और धार्मिक एकता के लिए सक्रिय है. यह लग़ातार काम कर रही है. सभी कार्यवाहियाँ टीम की भावना के साथ पूरी की जाती हैं. मेरी जानकारी के अनुसार, मेघों के किसी भी अन्य सामाजिक संगठन की अपेक्षा भगत महासभा का यह यूनिट अधिक कार्य कर पाया है और गाँव-गाँव में जा कर, लोगों से रूबरू हो कर एक वर्ष में बीसियों कार्यक्रम करने में सफल हुआ है. इसका मिशन मेघ भगतों को एक मज़बूत मंच देना है. प्राप्त अनुभव के साथ-साथ स्पष्ट दृष्टिकोण से यह टीम अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है.   

04-06-2012 को मुख्य कार्यक्रम था. तवी नदी गर्मी से गड़क रही थी और पैरेड ग्राऊँड तप रहा था. सुबह 10.00 बजे तक लोग आने शुरू हुए. डेढ़ घंटे में पंडाल भरने लगा. फिर जम्मू के आसपास के स्थानों/गाँवों से लोग पहुँचने लगे. तीन से चार हज़ार के आसपास लोग एकत्रित हो चुके थे. किसी सामाजिक या धार्मिक कार्यक्रम में मेघों का इतनी संख्या में पहुँचना और उन्हें देखना सुखद अनुभव था. (उल्लेखनीय है कि मेघों के अन्य संगठनों ने इस अवसर पर अलग-अलग स्थानों पर अपने कार्यक्रम आयोजित किए थे.)
इस बार भगत महासभा ने सत्संग और भजनों के कार्यक्रम के अतिरिक्त 90% से अधिक अंक पाने वाले होनहार छात्र-छात्राओं को मुख्य अतिथि और जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री श्री तारा चंद के कर कमलों से ट्राफियाँ दिलवा कर उनका सम्मान किया. ऐसे ही केएएस और आईएएस की परीक्षाएँ पास करने वाले युवाओं का भी सम्मान किया गया. इन युवाओं का उत्साह और आत्मविश्वास देखने योग्य था.
इस मौके पर डॉ. ध्यान सिंह, के मेघ भगतों (कबीरपंथियों) पर लिखे गए पहले शोधग्रंथ- पंजाब में कबीरपंथ का उद्भव और विकास– के महत्व को मान्यता देते हुए भगत महासभा ने उन्हें उप मुख्यमंत्री के कर कमलों से सम्मानित किया. डॉ. ध्यान सिंह को कई फोरम सम्मानित कर चुके हैं लेकिन उनके अपने समुदाय की ओर से किया गया यह सम्मान अपनी तरह का पहला था. जहाँ इस सम्मान का डॉ. ध्यान सिंह के लिए महत्व है, वहीं भगत महासभा, जम्मू बधाई की पात्र है और वह अपनी इस पहल पर गर्व कर सकेगी.
भगत महासभा ने उप मुख्यमंत्री महोदय से अपने धार्मिक-सामाजिक कार्यों और विकास के लिए माँगें रखीं. ईश्वर से प्रार्थना है और पूर्ण आशा है कि सरकारी मदद मिल जाएगी.

कई बातें शब्दों से बेहतर चित्र कहते हैं. इसलिए चित्रों से सुनिए :-

 
 
 
 
 
 
 
 
 

MEGHnet 

 

All India Satguru Kabir Sabha (1958) – आल इंडिया सत्गुरु कबीर सभा – (1958)

कल 03-08-2012 को आर्य समाज मंदिर, सैक्टर-16, चंडीगढ़ में श्रीमती तारा देवी की रस्म क्रिया के बाद भगत प्रेम चंद जी ने एक स्मारिका (Souvenir/सुवेनेयर – 2012-13) मुझे दी. 

आल इंडिया सत्गुरु कबीर सभा (1958), मेन बाज़ार, भार्गव नगर, जालंधर का नाम सुना था लेकिन मेरी जानकारी में नहीं था कि सभा (AISKS) ने इस वर्ष ऐसी स्मारिका का प्रकाशन किया है. इस स्मारिका को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ.
सुखद आश्चर्य इस लिए कि ये स्मारिकाएँ संस्था द्वारा संपन्न कार्यों का प्रकाशित दस्तावेज़ होता है. इसमें कार्यों की भूमिका, उनके महत्व, संबंधित विषयों पर आलेख, कार्यकर्ताओं और संगठन की गतिविधियों के बारे में जानकारी आदि होते हैं जो धीरे-धीरे एक इतिहास का निर्माण करते हैं. इस स्मारिका में यह सब कुछ दिखा.
यह स्मारिका सत्गुरु कबीर के 614वें प्रकाशोत्सव (04-06-2012) के अवसर पर जारी की गई थी. इसका संपादन श्री विनोद बॉबी (Vinod Bobby) ने किया है और उप संपादक श्री गुलशन आज़ाद (Gulshan Azad) हैं.
इस स्मारिका में काफी जानकारियाँ हैं. लेकिन जो मुझे अपने नज़रिए से महत्वपूर्ण लगीं उनका उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ. इसका संपादकीय जालंधर में कबीर मंदिरों (Kabir Temples) के विकास की संक्षिप्त कथा कहता है और इसमें शामिल आलेख कबीर से संबंधित जानकारी देते है. राजिन्द्र भगत द्वारा श्री अमरनाथ (आरे वाले) पर लिखा आलेख सिद्ध करता है कि अपने समाज के अग्रणियों पर अच्छा लिख कर हम आने वाली संतानों के लिए आदर्श जीवनियों का साहित्य निर्माण कर सकते हैं. यह अच्छी भाषा में लिखा आलेख है. ‘अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति पीठ – कबीर भवन’ पर लिखा आलेख प्रभावित करता है.
स्मारिका में प्रकाशित विज्ञापन बताते हैं कि मेघ भगतों ने इसके प्रकाशन में खूब सहयोग दिया है. बहुत-बहुत बधाई, क्योंकि यह करने योग्य कार्य है.
इस सभा के संस्थापकों में आर्यसमाज के अनुयायी मेघ भी कबीर सभा की इस स्मारिका में दिखे जो मेघ समाज में हो रहे परिवर्तन का द्योतक है. आर्यसमाजी विचारधारा के कारण मेघ भगत समाज ने कबीर और डॉ. भीमराव अंबेडकर को बहुत देर से अपनाया. यह देख कर अच्छा लगा कि इस स्मारिका में विवादास्पद लेखक श्री एल. आर. बाली (L.R. Bali) (‘भीम पत्रिका’ के संपादक) का आलेख भी छापा गया है जिन्होंने अपना पूरा जीवन अंबेडकर मिशन को समर्पित कर दिया है. मुझे आशा है कि मेघ भगत देर-सबेर डॉ. अंबेडकर, जो स्वयं कबीरपंथी थे, को जाने-समझेंगे.
स्मारिका में सभा के कार्यकर्ताओं का टीम अन्ना के साथ दिखना राजनीतिक संकेत करता है और यह अच्छा है.

आशा है कि मेघ भगतों के अन्य संगठन भी ऐसी स्मारिकाएँ छापने के बारे में विचार करेंगे. 

 स्मारिका की पूरी पीडीएफ फाइल आप नीचे दिए इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं


Souvenir (p. 1-32)

Souvenir (p. 33-64)

मेघ भगत